मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा विद्यार्थियों को जैविक खेती के माध्यम से शिक्षा के साथ स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्राचार्य डॉ. अरुण कुमार सिंह के मार्गदर्शन में जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे द्वारा विद्यार्थियों को कृषि की विभिन्न तकनीकों की जानकारी दी जा रही है।

इसी क्रम में स्नातक प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को मिट्टी परीक्षण के लिए मिट्टी का नमूना लेने की वैज्ञानिक एवं तकनीकी विधि का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि गेहूं की कटाई के बाद अप्रैल-मई माह में मिट्टी का नमूना लेना उपयुक्त रहता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र से वैज्ञानिक विधि के अनुसार 15 से 20 स्थानों से नमूने लिए जाने चाहिए।

खास बातें

  • एक हेक्टेयर क्षेत्र से वैज्ञानिक विधि के अनुसार 15 से 20 स्थानों से नमूने लिए जाने चाहिए।
  • विशेषज्ञ ने बताया कि प्रत्येक चयनित स्थान पर 6 से 9 इंच गहराई का वी-आकार का गड्ढा खोदकर ऊपर से नीचे तक की परत से लगभग 500 ग्राम मिट्टी ली जाती है।
  • सभी स्थानों से प्राप्त मिट्टी को अच्छी तरह मिलाने के बाद निर्धारित विधि से 500 ग्राम प्रतिनिधि नमूना अलग कर नमूना पत्र के साथ मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला भेजा जाता है।

विशेषज्ञ ने बताया कि प्रत्येक चयनित स्थान पर 6 से 9 इंच गहराई का वी-आकार का गड्ढा खोदकर ऊपर से नीचे तक की परत से लगभग 500 ग्राम मिट्टी ली जाती है। सभी स्थानों से प्राप्त मिट्टी को अच्छी तरह मिलाने के बाद निर्धारित विधि से 500 ग्राम प्रतिनिधि नमूना अलग कर नमूना पत्र के साथ मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला भेजा जाता है।

परीक्षण रिपोर्ट में प्राप्त परिणामों एवं अनुशंसाओं के आधार पर खेत में आवश्यक खाद एवं पोषक तत्वों की मात्रा निर्धारित करने की जानकारी भी दी गई। प्रशिक्षण में बताया गया कि मिट्टी परीक्षण के माध्यम से जैविक कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा पीएच मान की जानकारी प्राप्त होती है। इससे मिट्टी की अम्लीयता एवं क्षारीयता के साथ विद्युत चालकता के माध्यम से मिट्टी में घुलनशील लवणों की स्थिति का भी पता चलता है।

विद्यार्थियों को बताया गया कि मिट्टी परीक्षण से खेत की भौतिक एवं रासायनिक दशा, भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों तथा फसल के लिए आवश्यक उर्वरकों की सही मात्रा की जानकारी मिलती है। इससे अनावश्यक खाद के उपयोग को कम कर उत्पादन लागत में कमी और कृषि से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

साथ ही मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रत्येक दो से तीन वर्ष के अंतराल में मिट्टी परीक्षण कराने तथा नमूना लेते समय आवश्यक सावधानियां बरतने की जानकारी दी गई।