फसल अवशेष प्रबंधन परियोजना वर्ष 2026-27 के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, नरसिंहपुर द्वारा करेली में फसल अवशेष प्रबंधन विषय पर जिला स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम बुधवार को आयोजित किया गया। कार्यक्रम वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. विशाल मेश्राम के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में जनपद पंचायत करेली की अध्यक्ष प्रतिज्ञा परिहार एवं राष्ट्रीय बीज निगम के श्री नीरज सिंह उपस्थित रहे।
पराली जलाने से होने वाले नुकसान के प्रति किसानों को किया जागरूक
खास बातें
- पराली जलाने से होने वाले नुकसान के प्रति किसानों को किया जागरूक
- कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि फसल अवशेष खेत के लिए अनुपयोगी अपशिष्ट नहीं हैं।
- कार्यक्रम की प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. निधि प्रजापति ने किसानों को फसल अवशेषों के जैविक अपघटन की जानकारी दी।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को धान एवं गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बचे फसल अवशेष अर्थात पराली को जलाने से होने वाले दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना तथा फसल अवशेषों के पर्यावरण अनुकूल, वैज्ञानिक एवं टिकाऊ प्रबंधन के लिए प्रेरित करना था। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि फसल अवशेष खेत के लिए अनुपयोगी अपशिष्ट नहीं हैं। उचित प्रबंधन किए जाने पर इनका उपयोग मृदा में जैविक पदार्थ बढ़ाने, नमी संरक्षण एवं मृदा स्वास्थ्य सुधारने में किया जा सकता है। वहीं फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मिट्टी के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बायो-डीकंपोजर से फसल अवशेषों का करें जैविक अपघटन
कार्यक्रम की प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. निधि प्रजापति ने किसानों को फसल अवशेषों के जैविक अपघटन की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उपयुक्त परिस्थितियों में बायो-डीकंपोजर का उपयोग कर फसल अवशेषों के जैविक अपघटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। फसल अवशेषों को खेत में उचित नमी के साथ रखने एवं जैव अपघटन की प्रक्रिया अपनाने से उन्हें जैविक पदार्थ के रूप में खेत में उपयोग किया जा सकता है।
उन्होंने किसानों से पराली जलाने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करने तथा कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार बायो-डीकंपोजर एवं अन्य वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक वर्ष पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित हो सकते हैं, जिससे मृदा स्वास्थ्य एवं जैविक पदार्थ के चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
आधुनिक कृषि यंत्रों से फसल अवशेषों का प्रबंधन
वैज्ञानिक डॉ. एसआर शर्मा ने किसानों को मृदा की उपजाऊ परत, मृदा स्वास्थ्य एवं फसल अवशेषों के संरक्षण के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए मृदा स्वास्थ्य, जैविक पदार्थ एवं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।
उन्होंने किसानों को सुपर सीडर, स्मार्ट सीडर, हैप्पी सीडर एवं जीरो टिलेज मशीन जैसी आधुनिक कृषि मशीनरी के उपयोग की जानकारी देते हुए बताया कि इन तकनीकों की सहायता से फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करते हुए आगामी फसल की बुवाई की जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृषि यंत्रों का चयन स्थानीय परिस्थितियों, मिट्टी की स्थिति, उपलब्ध संसाधनों एवं फसल प्रणाली के अनुसार किया जाना चाहिए।
किसानों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कृषि यंत्रों एवं कस्टम हायरिंग की सुविधाओं का लाभ लेने के लिए भी प्रेरित किया गया।
फसल अवशेष खेत में रखने से मृदा स्वास्थ्य को लाभ
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आशुतोष शर्मा ने पराली प्रबंधन से मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फसल अवशेषों को खेत में बनाए रखना अथवा उचित तकनीक से मिट्टी में मिलाना कई प्रकार से उपयोगी हो सकता है। इससे खेत में जैविक पदार्थ की उपलब्धता, नमी संरक्षण एवं मृदा संरचना के प्रबंधन में सहायता मिलती है।
किसानों को बताया गया कि पराली जलाने से तत्काल खेत की सफाई हो जाती है, लेकिन इसके दीर्घकालीन प्रभाव मृदा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए प्रतिकूल हो सकते हैं। कार्यक्रम के आयोजन में महिला शक्ति पूजा स्वयं सहायता समूह, सीईओ जनपद पंचायत करेली श्री जगदीश मेहरा तथा एनआरएलएम से श्री प्रमोद पारे का विशेष सहयोग रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों तक कृषि वैज्ञानिकों की नवीनतम तकनीकी जानकारी पहुंचाना तथा स्थानीय स्तर पर फसल अवशेष प्रबंधन की व्यवहारिक, वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देना है।


